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Title: How to Be Disciplined (Urdu Summary) | Transform Your Life Like Successful People
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दानिश कुतुब में खुशामदीद। यह एक ऐसा सवाल
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है जो हम सब ने कभी ना कभी खुद से जरूर
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पूछा होगा। हम अक्सर जानते हैं कि जिंदगी
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को बेहतर बनाने के लिए क्या करना चाहिए।
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सेहतमंद खाना, वर्जिश करना, नई चीजें
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सीखना और हम शुरुआत भी करते हैं बड़े जोशो
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खरोश से। किसी नए साल के आगाज पर या पीर
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की सुबह। लेकिन फिर क्या होता है? बुध या
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जुमेरात आते-आते वो सारा जोश कहीं गायब हो
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जाता है और हम खुद को ठीक वहीं पर आते हैं
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जहां से शुरू किया था। ऐसा लगता है जैसे
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कोई नादीदा ताकत हमें पकड़ कर हमारे
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कंफर्ट जोन में वापस खींच लाती है। और सच
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पूछें तो यह एक ऐसी जंग है जिसमें हमारा
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सबसे बड़ा दुश्मन कोई और नहीं बल्कि हम
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खुद हैं। तो आखिर मसला है कहां? दरअसल
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उसकी जड़ हमारी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है
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कि हम कामयाबी के लिए मोटिवेशन पर भरोसा
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करते हैं। लेकिन सच यह है कि मोटिवेशन एक
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बहुत ही नाकाबिले एतबार साथी है। यह तो एक
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एहसास है और एहसासात आप जानते हैं मौसम की
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तरह बदलते रहते हैं। आज आप पुरजोश हैं कल
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शायद थके हुए हो। इसके बिल्कुल बरक्स
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नज्मो जब्त एक निजाम है। यह इस बात पर
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मुनसर नहीं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं।
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यह उस अज्म पर मुनसर है जो आपने खुद से
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किया है। मोटिवेशन एक तेज लहर की तरह है
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जो आपको थोड़ी दूर तो ले जाती है लेकिन
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फिर गायब हो जाती है। जबकि नज्मो जब्त एक
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लंगर है जो समंदर में तूफान आने पर भी
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आपकी कश्ती को मजबूती से अपनी जगह पर रखता
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है। [संगीत] आज की इस गुफ्तगू में हम
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नज़्मोज़ जब्त को एक बोझ के तौर पर नहीं
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बल्कि हकीकी आजादी की चाबी के तौर पर
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समझेंगे। जब हम नज़्मो जब्त का लफ्ज सुनते
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हैं ना तो फौरन ज़हन में क्या आता है?
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पाबंदी, सख्ती और शायद थोड़ी सी बोरियत।
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लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक रुख है।
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हकीकत में हकीकी आजादी बेलगाम ख्वाहिशात
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की पैरवी करने में नहीं है बल्कि अपने आप
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पर काबू पाने में है। और यही वह आजादी है
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जो हमें उस जिंदगी की तरफ ले जाती है
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जिसकी हम वाकई ख्वाहिश रखते हैं। जरा इस
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बात पर सोचिए। जब आप सुबह उठने का फैसला
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करते हैं लेकिन आपका दिल कहता है बस 5
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मिनट और आप उसकी मान लेते हैं तो उस वक्त
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मालिक कौन है? आप या आपका एहसास? नज्मो
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जब्त आपको यह ताकत देता है कि आप अपने
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एहसासात और वक्त ख्वाहिशात से ऊपर उठकर वह
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फैसले करें जो आपके मुस्तकबिल के लिए
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बेहतर हो। [संगीत] जब आप नज्मो जब्त
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अपनाते हैं तो आप अपनी जिंदगी के ड्राइवर
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बन जाते हैं ना कि एक मुसाफिर जो हालात की
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लहरों पर बहता चला जाए। यही तो पछतावे और
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वक्त लज्जतों की गुलामी से हकीकी आजादी
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है। [संगीत] अच्छा अब हम नज्मो जब्त की
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इमारत की सबसे अहम बुनियाद पर बात करने जा
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रहे हैं। इस बुनियाद के बगैर समझ लीजिए कि
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कोई भी कोशिश रेत के घर की तरह ढेर हो
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जाती है। यह वह बुनियादी वजह है जो आपको
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हर मुश्किल में आगे बढ़ने की ताकत देती
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है। अगर हमें यह मालूम ही ना हो कि हम यह
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सब कुछ किस लिए कर रहे हैं तो हर कदम एक
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बोझ लगेगा। है ना? सुबह जल्दी उठना एक सजा
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लगेगा। वर्जिश करना एक अज़यत और सेहतमंद
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खाना एक कुर्बानी। कोई भी इंसान सिर्फ
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इसलिए तकलीफ बर्दाश्त नहीं करता कि किसी
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किताब में ऐसा लिखा है जब मकसद वाजे ना हो
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तो हमारा ज़हन हजार बहाने बनाता है और
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आखिरकार हिम्मत हार देता है। और बस यही वो
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नुक्ता है जहां से सारा खेल बदल जाता है।
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आपका क्यों वो अंदरूनी आग है वो ईंधन है
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जो आपकी गाड़ी को तब भी चलाती रहती है जब
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मोटिवेशन का पेट्रोल खत्म हो चुका हो। यह
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क्यों आपका कोई ख्वाब हो सकता है? अपने
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खानदान को बेहतर जिंदगी देने की ख्वाहिश
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हो सकती है या किसी तकलीफदा हाल से निकलने
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की शदीद तड़प हो सकती है। जब यह क्यों
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आपके दिलो दिमाग पर छा जाता है तो नज्मो
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जब्त सजा नहीं बल्कि अपने मकसद तक पहुंचने
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का सबसे बेहतरीन रास्ता बन जाता है। यह
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मशहूर कॉल नज्मो जब्त की पूरी नफसियात का
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खुलासा है। तो अपने आप से पूछें आपकी
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जिंदगी का सबसे गहरा सबसे जज्बाती क्यों
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क्या है? वह कौन सी चीज है जिसके लिए आप
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कोई भी कीमत अदा करने को तैयार हैं? उस
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वजह को तलाश करें। उसे कहीं लिख लें और
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उसे रोजाना खुद को याद दिलाएं। क्योंकि जब
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आपका क्यों इतना मजबूत होगा कि वह आपकी
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रूह में बस जाए तो कैसे यानी रास्ते की
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मुश्किलात, थकावट और कुर्बानियां सब बहुत
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छोटी लगने लगेंगी। तो जब आपका क्यों वाज़
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हो जाए तो अगला कदम क्या है? अब वक्त है
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कि इस क्यों को एक अमली निजाम में ढाला
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जाए। इसके लिए हम रतिक की कहानी से
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सीखेंगे। एक आम नौजवान जिसने अपनी जिंदगी
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को तीन बुनियादी उसूलों पर अमल करके
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मुकम्मल तौर पर बदल दिया। यह उसूल नज्मो
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जब्त के तीन सुतून हैं। रीतिक की जिंदगी
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पहले अफरातफरी का शिकार थी। वो बहुत कुछ
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करना चाहता था लेकिन कुछ भी नहीं कर पा
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रहा था क्योंकि उसके पास कोई मंसूबा ही
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नहीं था। इन तीन सतूनों ने उसे एक वाज़
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नक्शा दे दिया। पहला उसने अपनी मुबहम
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ख्वाहिशात को ठोस एहदाफ में बदला। दूसरा
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उसने उन एहदाफ तक पहुंचने के लिए रोजाना
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का एक मामूल बनाया और तीसरा उसने उन चीजों
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को ना कहना सीखा जो उसे रास्ते से भटका
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रही थी। आइए इनको थोड़ा तफसील से देखते
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हैं। इस स्लाइड की सबसे खास बात इसकी
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वजाहत है। देखिए रतिक ने यह नहीं कहा कि
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मुझे वजन कम करना है। नहीं उसने कहा मुझे
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6 महीनों में 10 किलो वजन कम करना है।
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उसने यह नहीं कहा कि मुझे कुछ सीखना है।
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उसने [संगीत] तीन मखसूस कोर्सेज का इंतखाब
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किया। आदाफ का मखसूस और काबिले पैमाइश
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होना बहुत जरूरी है ताकि आप अपनी पेशरफ्त
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को देख सकें। और यह भी देखिए कि उसने अपने
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जाती ताल्लुकात यानी वालिदैन को फोन करने
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को भी एक हदफ बनाया जो यह जाहिर करता है
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कि नज्मो जब्त जिंदगी के हर पहलू में
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तवाजन लाने का नाम है। [संगीत] जब्ते
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नफव्ज़ या सेल्फ कंट्रोल यह कोई पैदाइशी
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खूबी नहीं है। ये एक ऐसी महारत है जिसे
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वक्त के साथ बनाया जा सकता है। बिल्कुल एक
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पट्ठे की तरह आप जितना इसे इस्तेमाल
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करेंगे ये उतना ही मजबूत होता जाएगा। रतिक
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के लिए सबसे बड़ी रुकावट उसका फोन था।
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उसने उन तमाम एप्स को डिलीट कर दिया जो
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उसका वक्त जाया करती थी। जब उसके दोस्तों
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ने उसे एक पार्टी में बुलाया जिस रात उसे
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पढ़ाई करनी थी तो उसने मुश्किल के बावजूद
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ना कहा। हर बार जब आप एक फरी लज्जत को
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अपने बड़े मकसद के लिए कुर्बान करते हैं
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तो आप अपने जब्ते नफ्स के पट्ठे को और
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मजबूत बना रहे होते हैं। ठीक है? तो अब
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हमारे पास एक मजबूत क्यों भी है और अमल का
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एक वाज़ मंसूबा भी। लेकिन कहानी यहां खत्म
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नहीं होती क्योंकि असल जंग बाहर के हालात
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से नहीं बल्कि हमारे अपने दिमाग के अंदर
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लड़ी जाती है। अमल सिर्फ आधी [संगीत] जंग
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है। बाकी आधी जंग ज़हनी है। माहरीन हमारे
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दिमाग को अक्सर बंदर ज़हन कहते हैं।
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क्योंकि यह एक बेचैन बंदर की तरह एक शाख
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से दूसरी शाख पर यानी एक सोच से दूसरी सोच
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पर छलांगे लगाता रहता है। यह हमें माज़ के
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पछतावों और मुस्तकबिल की परेशानियों में
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उलझाए रखता है। रतिक ने इसका मुकाबला करने
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के लिए माइंडफुलनेस मेडिटेशन का सहारा
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लिया। रोजाना सिर्फ 10 मिनट की मश्क ने
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उसे अपने ख्यालात का गुलाम बनने के बजाय
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उनका मुशाहदा करने वाला बना दिया। इससे
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उसकी तवज्जो मरकूज करने की सलाहियत बढ़ी
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और बेचैनी में कमी आई। नज्मो जब्त का
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रास्ता सीधा नहीं है। इसमें उतार-चढ़ाव
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आएंगे। आप गिरेंगे और नाकामयाबियां भी
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होंगी। अहम नुक्ता यह नहीं है कि आप
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गिरेंगे या नहीं। क्योंकि यह तो यकीनी है।
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अहम नुक्ता यह है कि आप गिरने के बाद करते
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क्या हैं? नाकामी को एक नाकाबिले उबूर
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दीवार समझना ही सबसे बड़ी गलती है। यह एक
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सवाल आपके पूरे नुक्ता-ए- नजर को बदल सकता
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है। जब रतिक का एक बड़ा प्रोजेक्ट बुरी
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तरह नाकाम हुआ तो उसने हिम्मत हारने के
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बजाय बैठकर तजिया किया। गलती कहां हुई?
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मैं इस तजुर्बे से क्या सीख सकता हूं?
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उसने इस नाकामी को डाटा इकट्ठा करने का एक
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मौका समझा। उसने जो सबक सीखे उनकी बुनियाद
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पर उसने अगली बार एक बेहतर हिकमत अमली
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बनाई और कामयाबी हासिल की। तो नाकामी को
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एक उस्ताद समझें। एक दुश्मन नहीं। अब हम
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अपने आखिरी और शायद सबसे अहम हिस्से की
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तरफ बढ़ रहे हैं। हमने क्यों की ताकत को
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समझा? अमल का मंसूबा बनाया और अंदरूनी जंग
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लड़ने के तरीके सीखे। अब सवाल यह है कि इस
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सबको तवील मुद्दत तक कैसे जारी रखा जाए।
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असल जादू किसी एक दिन की बेपनाह मेहनत में
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नहीं है बल्कि सैकड़ों दिनों की छोटी-छोटी
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मुसलसल कोशिशों में है। कामयाबी एक
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स्प्रिंट नहीं एक मैराथॉन है। असल चैलेंज
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उस दिन काम करना है जब आपका दिल बिल्कुल
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ना चाह रहा हो। जब आप थके हुए हो जब
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मोटिवेशन सिफर हो। मुस्तकिल मिजाजी का
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मतलब है हर रोज चाहे अच्छा हो या बुरा
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अपने वादे पर कायम रहना। और यही वह चीज है
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जो आम लोगों को गैर मामूली लोगों से अलग
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करती है। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि
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नज्मो जब्त का मतलब है कभी कोई गलती ना
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करना। यह सोच ही हमारे ऊपर बहुत ज्यादा
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दबाव डाल देती है। अगर आपने डाइट के दौरान
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एक दिन कुछ गैर सेहतमंद खा लिया तो इसका
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मतलब यह नहीं कि आप नाकाम हो गए और सब कुछ
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खत्म हो गया। यह सब कुछ या कुछ भी नहीं
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वाली जहनियत बहुत खतरनाक है। नज्मो जब्त
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की असल ताकत गिरने के बाद उठने की सलाहियत
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में है। इसकी असल खूबसूरती साबित कदमी में
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है। अगर एक दिन आपका मामूल टूट जाए तो अहम
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यह है कि आप अगले दिन फौरन वापस ट्रैक पर
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आ जाएं।
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[संगीत]
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जीतने वाले वह नहीं होते जो कभी नहीं
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गिरते बल्कि वह होते हैं जो हर बार गिर कर
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उठने की हिम्मत रखते हैं। याद रखिए यह सफर
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परफेक्शन का नहीं बल्कि पेशरफ्त का है।
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नज्मो जब्त की अजीम इमारत एक-एक ईंट से
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बनती है। आज खुद से कोई बड़ा नामुमकिन
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वादा ना करें। सिर्फ एक छोटा सा वादा करें
(00:09:28)
और उसे हर हाल में पूरा करें। चाहे वह 10
(00:09:31)
मिनट की वॉक हो, किताब का एक सफा पढ़ना हो
(00:09:34)
या बस एक गिलास पानी पीना हो। क्योंकि जब
(00:09:36)
आप खुद से किया हुआ एक छोटा वादा पूरा
(00:09:39)
करते हैं तो आप अपने ऊपर एतमाद पैदा करते
(00:09:41)
हैं और यही छोटा वादा एक मुनज्जम जिंदगी
(00:09:44)
के अजीम सफर का पहला कदम है। अगर इस तजिए
(00:09:47)
ने आपको कुछ सोचने पर मजबूर किया है तो
(00:09:50)
इसे लाइक करें, सब्सक्राइब करें और अपने
(00:09:52)
उन दोस्तों और खानदान वालों के साथ शेयर
(00:09:54)
करें जो अपनी जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते
(00:09:56)
हैं। अगली बार मिलते हैं।
