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How to Be Disciplined (Urdu Summary) | Transform Your Life Like Successful People (YouTube Video Transcript)

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Title: How to Be Disciplined (Urdu Summary) | Transform Your Life Like Successful People
Duration: 00:09:58
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(00:00:00) Your YouTube transcript will appear here (00:00:00) दानिश कुतुब में खुशामदीद। यह एक ऐसा सवाल (00:00:03) है जो हम सब ने कभी ना कभी खुद से जरूर (00:00:06) पूछा होगा। हम अक्सर जानते हैं कि जिंदगी (00:00:09) को बेहतर बनाने के लिए क्या करना चाहिए। (00:00:11) सेहतमंद खाना, वर्जिश करना, नई चीजें (00:00:14) सीखना और हम शुरुआत भी करते हैं बड़े जोशो (00:00:17) खरोश से। किसी नए साल के आगाज पर या पीर (00:00:20) की सुबह। लेकिन फिर क्या होता है? बुध या (00:00:22) जुमेरात आते-आते वो सारा जोश कहीं गायब हो (00:00:25) जाता है और हम खुद को ठीक वहीं पर आते हैं (00:00:28) जहां से शुरू किया था। ऐसा लगता है जैसे (00:00:30) कोई नादीदा ताकत हमें पकड़ कर हमारे (00:00:32) कंफर्ट जोन में वापस खींच लाती है। और सच (00:00:35) पूछें तो यह एक ऐसी जंग है जिसमें हमारा (00:00:37) सबसे बड़ा दुश्मन कोई और नहीं बल्कि हम (00:00:40) खुद हैं। तो आखिर मसला है कहां? दरअसल (00:00:43) उसकी जड़ हमारी एक बहुत बड़ी गलतफहमी है (00:00:47) कि हम कामयाबी के लिए मोटिवेशन पर भरोसा (00:00:50) करते हैं। लेकिन सच यह है कि मोटिवेशन एक (00:00:53) बहुत ही नाकाबिले एतबार साथी है। यह तो एक (00:00:56) एहसास है और एहसासात आप जानते हैं मौसम की (00:00:59) तरह बदलते रहते हैं। आज आप पुरजोश हैं कल (00:01:02) शायद थके हुए हो। इसके बिल्कुल बरक्स (00:01:04) नज्मो जब्त एक निजाम है। यह इस बात पर (00:01:07) मुनसर नहीं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं। (00:01:10) यह उस अज्म पर मुनसर है जो आपने खुद से (00:01:13) किया है। मोटिवेशन एक तेज लहर की तरह है (00:01:16) जो आपको थोड़ी दूर तो ले जाती है लेकिन (00:01:18) फिर गायब हो जाती है। जबकि नज्मो जब्त एक (00:01:21) लंगर है जो समंदर में तूफान आने पर भी (00:01:24) आपकी कश्ती को मजबूती से अपनी जगह पर रखता (00:01:26) है। [संगीत] आज की इस गुफ्तगू में हम (00:01:28) नज़्मोज़ जब्त को एक बोझ के तौर पर नहीं (00:01:30) बल्कि हकीकी आजादी की चाबी के तौर पर (00:01:33) समझेंगे। जब हम नज़्मो जब्त का लफ्ज सुनते (00:01:36) हैं ना तो फौरन ज़हन में क्या आता है? (00:01:38) पाबंदी, सख्ती और शायद थोड़ी सी बोरियत। (00:01:42) लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक रुख है। (00:01:45) हकीकत में हकीकी आजादी बेलगाम ख्वाहिशात (00:01:48) की पैरवी करने में नहीं है बल्कि अपने आप (00:01:51) पर काबू पाने में है। और यही वह आजादी है (00:01:54) जो हमें उस जिंदगी की तरफ ले जाती है (00:01:57) जिसकी हम वाकई ख्वाहिश रखते हैं। जरा इस (00:02:00) बात पर सोचिए। जब आप सुबह उठने का फैसला (00:02:02) करते हैं लेकिन आपका दिल कहता है बस 5 (00:02:05) मिनट और आप उसकी मान लेते हैं तो उस वक्त (00:02:08) मालिक कौन है? आप या आपका एहसास? नज्मो (00:02:12) जब्त आपको यह ताकत देता है कि आप अपने (00:02:15) एहसासात और वक्त ख्वाहिशात से ऊपर उठकर वह (00:02:18) फैसले करें जो आपके मुस्तकबिल के लिए (00:02:20) बेहतर हो। [संगीत] जब आप नज्मो जब्त (00:02:22) अपनाते हैं तो आप अपनी जिंदगी के ड्राइवर (00:02:25) बन जाते हैं ना कि एक मुसाफिर जो हालात की (00:02:27) लहरों पर बहता चला जाए। यही तो पछतावे और (00:02:30) वक्त लज्जतों की गुलामी से हकीकी आजादी (00:02:33) है। [संगीत] अच्छा अब हम नज्मो जब्त की (00:02:36) इमारत की सबसे अहम बुनियाद पर बात करने जा (00:02:39) रहे हैं। इस बुनियाद के बगैर समझ लीजिए कि (00:02:42) कोई भी कोशिश रेत के घर की तरह ढेर हो (00:02:45) जाती है। यह वह बुनियादी वजह है जो आपको (00:02:47) हर मुश्किल में आगे बढ़ने की ताकत देती (00:02:50) है। अगर हमें यह मालूम ही ना हो कि हम यह (00:02:53) सब कुछ किस लिए कर रहे हैं तो हर कदम एक (00:02:56) बोझ लगेगा। है ना? सुबह जल्दी उठना एक सजा (00:02:59) लगेगा। वर्जिश करना एक अज़यत और सेहतमंद (00:03:02) खाना एक कुर्बानी। कोई भी इंसान सिर्फ (00:03:04) इसलिए तकलीफ बर्दाश्त नहीं करता कि किसी (00:03:06) किताब में ऐसा लिखा है जब मकसद वाजे ना हो (00:03:09) तो हमारा ज़हन हजार बहाने बनाता है और (00:03:12) आखिरकार हिम्मत हार देता है। और बस यही वो (00:03:15) नुक्ता है जहां से सारा खेल बदल जाता है। (00:03:19) आपका क्यों वो अंदरूनी आग है वो ईंधन है (00:03:22) जो आपकी गाड़ी को तब भी चलाती रहती है जब (00:03:25) मोटिवेशन का पेट्रोल खत्म हो चुका हो। यह (00:03:28) क्यों आपका कोई ख्वाब हो सकता है? अपने (00:03:30) खानदान को बेहतर जिंदगी देने की ख्वाहिश (00:03:32) हो सकती है या किसी तकलीफदा हाल से निकलने (00:03:34) की शदीद तड़प हो सकती है। जब यह क्यों (00:03:37) आपके दिलो दिमाग पर छा जाता है तो नज्मो (00:03:40) जब्त सजा नहीं बल्कि अपने मकसद तक पहुंचने (00:03:43) का सबसे बेहतरीन रास्ता बन जाता है। यह (00:03:46) मशहूर कॉल नज्मो जब्त की पूरी नफसियात का (00:03:49) खुलासा है। तो अपने आप से पूछें आपकी (00:03:52) जिंदगी का सबसे गहरा सबसे जज्बाती क्यों (00:03:55) क्या है? वह कौन सी चीज है जिसके लिए आप (00:03:58) कोई भी कीमत अदा करने को तैयार हैं? उस (00:04:00) वजह को तलाश करें। उसे कहीं लिख लें और (00:04:03) उसे रोजाना खुद को याद दिलाएं। क्योंकि जब (00:04:06) आपका क्यों इतना मजबूत होगा कि वह आपकी (00:04:09) रूह में बस जाए तो कैसे यानी रास्ते की (00:04:12) मुश्किलात, थकावट और कुर्बानियां सब बहुत (00:04:15) छोटी लगने लगेंगी। तो जब आपका क्यों वाज़ (00:04:18) हो जाए तो अगला कदम क्या है? अब वक्त है (00:04:21) कि इस क्यों को एक अमली निजाम में ढाला (00:04:23) जाए। इसके लिए हम रतिक की कहानी से (00:04:25) सीखेंगे। एक आम नौजवान जिसने अपनी जिंदगी (00:04:28) को तीन बुनियादी उसूलों पर अमल करके (00:04:30) मुकम्मल तौर पर बदल दिया। यह उसूल नज्मो (00:04:33) जब्त के तीन सुतून हैं। रीतिक की जिंदगी (00:04:36) पहले अफरातफरी का शिकार थी। वो बहुत कुछ (00:04:38) करना चाहता था लेकिन कुछ भी नहीं कर पा (00:04:40) रहा था क्योंकि उसके पास कोई मंसूबा ही (00:04:42) नहीं था। इन तीन सतूनों ने उसे एक वाज़ (00:04:45) नक्शा दे दिया। पहला उसने अपनी मुबहम (00:04:47) ख्वाहिशात को ठोस एहदाफ में बदला। दूसरा (00:04:50) उसने उन एहदाफ तक पहुंचने के लिए रोजाना (00:04:53) का एक मामूल बनाया और तीसरा उसने उन चीजों (00:04:56) को ना कहना सीखा जो उसे रास्ते से भटका (00:04:58) रही थी। आइए इनको थोड़ा तफसील से देखते (00:05:01) हैं। इस स्लाइड की सबसे खास बात इसकी (00:05:04) वजाहत है। देखिए रतिक ने यह नहीं कहा कि (00:05:08) मुझे वजन कम करना है। नहीं उसने कहा मुझे (00:05:11) 6 महीनों में 10 किलो वजन कम करना है। (00:05:14) उसने यह नहीं कहा कि मुझे कुछ सीखना है। (00:05:17) उसने [संगीत] तीन मखसूस कोर्सेज का इंतखाब (00:05:20) किया। आदाफ का मखसूस और काबिले पैमाइश (00:05:23) होना बहुत जरूरी है ताकि आप अपनी पेशरफ्त (00:05:26) को देख सकें। और यह भी देखिए कि उसने अपने (00:05:28) जाती ताल्लुकात यानी वालिदैन को फोन करने (00:05:31) को भी एक हदफ बनाया जो यह जाहिर करता है (00:05:34) कि नज्मो जब्त जिंदगी के हर पहलू में (00:05:36) तवाजन लाने का नाम है। [संगीत] जब्ते (00:05:38) नफव्ज़ या सेल्फ कंट्रोल यह कोई पैदाइशी (00:05:41) खूबी नहीं है। ये एक ऐसी महारत है जिसे (00:05:43) वक्त के साथ बनाया जा सकता है। बिल्कुल एक (00:05:45) पट्ठे की तरह आप जितना इसे इस्तेमाल (00:05:48) करेंगे ये उतना ही मजबूत होता जाएगा। रतिक (00:05:51) के लिए सबसे बड़ी रुकावट उसका फोन था। (00:05:53) उसने उन तमाम एप्स को डिलीट कर दिया जो (00:05:55) उसका वक्त जाया करती थी। जब उसके दोस्तों (00:05:57) ने उसे एक पार्टी में बुलाया जिस रात उसे (00:05:59) पढ़ाई करनी थी तो उसने मुश्किल के बावजूद (00:06:02) ना कहा। हर बार जब आप एक फरी लज्जत को (00:06:04) अपने बड़े मकसद के लिए कुर्बान करते हैं (00:06:06) तो आप अपने जब्ते नफ्स के पट्ठे को और (00:06:08) मजबूत बना रहे होते हैं। ठीक है? तो अब (00:06:11) हमारे पास एक मजबूत क्यों भी है और अमल का (00:06:13) एक वाज़ मंसूबा भी। लेकिन कहानी यहां खत्म (00:06:16) नहीं होती क्योंकि असल जंग बाहर के हालात (00:06:19) से नहीं बल्कि हमारे अपने दिमाग के अंदर (00:06:21) लड़ी जाती है। अमल सिर्फ आधी [संगीत] जंग (00:06:24) है। बाकी आधी जंग ज़हनी है। माहरीन हमारे (00:06:27) दिमाग को अक्सर बंदर ज़हन कहते हैं। (00:06:29) क्योंकि यह एक बेचैन बंदर की तरह एक शाख (00:06:33) से दूसरी शाख पर यानी एक सोच से दूसरी सोच (00:06:36) पर छलांगे लगाता रहता है। यह हमें माज़ के (00:06:39) पछतावों और मुस्तकबिल की परेशानियों में (00:06:41) उलझाए रखता है। रतिक ने इसका मुकाबला करने (00:06:44) के लिए माइंडफुलनेस मेडिटेशन का सहारा (00:06:47) लिया। रोजाना सिर्फ 10 मिनट की मश्क ने (00:06:50) उसे अपने ख्यालात का गुलाम बनने के बजाय (00:06:52) उनका मुशाहदा करने वाला बना दिया। इससे (00:06:55) उसकी तवज्जो मरकूज करने की सलाहियत बढ़ी (00:06:58) और बेचैनी में कमी आई। नज्मो जब्त का (00:07:01) रास्ता सीधा नहीं है। इसमें उतार-चढ़ाव (00:07:04) आएंगे। आप गिरेंगे और नाकामयाबियां भी (00:07:07) होंगी। अहम नुक्ता यह नहीं है कि आप (00:07:09) गिरेंगे या नहीं। क्योंकि यह तो यकीनी है। (00:07:12) अहम नुक्ता यह है कि आप गिरने के बाद करते (00:07:15) क्या हैं? नाकामी को एक नाकाबिले उबूर (00:07:18) दीवार समझना ही सबसे बड़ी गलती है। यह एक (00:07:21) सवाल आपके पूरे नुक्ता-ए- नजर को बदल सकता (00:07:24) है। जब रतिक का एक बड़ा प्रोजेक्ट बुरी (00:07:27) तरह नाकाम हुआ तो उसने हिम्मत हारने के (00:07:29) बजाय बैठकर तजिया किया। गलती कहां हुई? (00:07:33) मैं इस तजुर्बे से क्या सीख सकता हूं? (00:07:35) उसने इस नाकामी को डाटा इकट्ठा करने का एक (00:07:38) मौका समझा। उसने जो सबक सीखे उनकी बुनियाद (00:07:41) पर उसने अगली बार एक बेहतर हिकमत अमली (00:07:44) बनाई और कामयाबी हासिल की। तो नाकामी को (00:07:47) एक उस्ताद समझें। एक दुश्मन नहीं। अब हम (00:07:50) अपने आखिरी और शायद सबसे अहम हिस्से की (00:07:53) तरफ बढ़ रहे हैं। हमने क्यों की ताकत को (00:07:56) समझा? अमल का मंसूबा बनाया और अंदरूनी जंग (00:07:59) लड़ने के तरीके सीखे। अब सवाल यह है कि इस (00:08:02) सबको तवील मुद्दत तक कैसे जारी रखा जाए। (00:08:06) असल जादू किसी एक दिन की बेपनाह मेहनत में (00:08:08) नहीं है बल्कि सैकड़ों दिनों की छोटी-छोटी (00:08:11) मुसलसल कोशिशों में है। कामयाबी एक (00:08:14) स्प्रिंट नहीं एक मैराथॉन है। असल चैलेंज (00:08:16) उस दिन काम करना है जब आपका दिल बिल्कुल (00:08:18) ना चाह रहा हो। जब आप थके हुए हो जब (00:08:20) मोटिवेशन सिफर हो। मुस्तकिल मिजाजी का (00:08:23) मतलब है हर रोज चाहे अच्छा हो या बुरा (00:08:26) अपने वादे पर कायम रहना। और यही वह चीज है (00:08:29) जो आम लोगों को गैर मामूली लोगों से अलग (00:08:31) करती है। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि (00:08:34) नज्मो जब्त का मतलब है कभी कोई गलती ना (00:08:37) करना। यह सोच ही हमारे ऊपर बहुत ज्यादा (00:08:40) दबाव डाल देती है। अगर आपने डाइट के दौरान (00:08:43) एक दिन कुछ गैर सेहतमंद खा लिया तो इसका (00:08:46) मतलब यह नहीं कि आप नाकाम हो गए और सब कुछ (00:08:48) खत्म हो गया। यह सब कुछ या कुछ भी नहीं (00:08:52) वाली जहनियत बहुत खतरनाक है। नज्मो जब्त (00:08:55) की असल ताकत गिरने के बाद उठने की सलाहियत (00:08:58) में है। इसकी असल खूबसूरती साबित कदमी में (00:09:01) है। अगर एक दिन आपका मामूल टूट जाए तो अहम (00:09:04) यह है कि आप अगले दिन फौरन वापस ट्रैक पर (00:09:07) आ जाएं। (00:09:08) [संगीत] (00:09:08) जीतने वाले वह नहीं होते जो कभी नहीं (00:09:10) गिरते बल्कि वह होते हैं जो हर बार गिर कर (00:09:13) उठने की हिम्मत रखते हैं। याद रखिए यह सफर (00:09:17) परफेक्शन का नहीं बल्कि पेशरफ्त का है। (00:09:20) नज्मो जब्त की अजीम इमारत एक-एक ईंट से (00:09:23) बनती है। आज खुद से कोई बड़ा नामुमकिन (00:09:26) वादा ना करें। सिर्फ एक छोटा सा वादा करें (00:09:28) और उसे हर हाल में पूरा करें। चाहे वह 10 (00:09:31) मिनट की वॉक हो, किताब का एक सफा पढ़ना हो (00:09:34) या बस एक गिलास पानी पीना हो। क्योंकि जब (00:09:36) आप खुद से किया हुआ एक छोटा वादा पूरा (00:09:39) करते हैं तो आप अपने ऊपर एतमाद पैदा करते (00:09:41) हैं और यही छोटा वादा एक मुनज्जम जिंदगी (00:09:44) के अजीम सफर का पहला कदम है। अगर इस तजिए (00:09:47) ने आपको कुछ सोचने पर मजबूर किया है तो (00:09:50) इसे लाइक करें, सब्सक्राइब करें और अपने (00:09:52) उन दोस्तों और खानदान वालों के साथ शेयर (00:09:54) करें जो अपनी जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते (00:09:56) हैं। अगली बार मिलते हैं।

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