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Title: Test Construction in Psychology | Process, Item Writing & Item Analysis | UGC NET Masterclass
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सो हेलो स्टूडेंट्स। स्वागत है आप सभी का
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एक नए एपिसोड में एक नए लेक्चर में। सो आज
(00:00:06)
के इस एपिसोड में हम लोग डिस्कस करने वाले
(00:00:08)
हैं टेस्ट कंस्ट्रक्शन। टेस्ट
(00:00:10)
कंस्ट्रक्शंस क्या होता है? इसके बारे में
(00:00:13)
हम लोग डिस्कस करेंगे और आइटम राइटिंग और
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आइटम एनालिसिस क्या होता है? इसके अंतर्गत
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इस चीज को एक इस एपिसोड में हम लोग
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एक्सप्लोर करने वाले हैं। ठीक है? अब हम
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लोग आगे बढ़ते हैं और डिस्कस करते हैं। तो
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अगर आप कोच नीतीश कुमार चैनल पर नए हैं तो
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नीतीश कुमार चैनल को सब्सक्राइब कर
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दीजिएगा। वीडियो को लाइक कर दीजिएगा और
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दोस्तों के पास शेयर भी कर दीजिएगा। ठीक
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है? अब हम लोग आगे बढ़ते हैं और डिस्कस
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करते हैं कि टेस्ट कंस्ट्रक्शंस होता क्या
(00:00:38)
है? सो समझिए कि टेस्ट कंस्ट्रक्शन का
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मतलब ये होता है कि टेस्ट को बनाने की एक
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प्रक्रिया होती है जिसमें हम टेस्ट को
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बनाते हैं। सो साइकोलॉजिकल टेस्ट को
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साइंटिफिकली और सिस्टमैटिकली डेवलप करने
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की जो प्रक्रिया होती है वही होता है क्या
(00:00:52)
आपका टेस्ट कंस्ट्रक्शन कहलाता है। ठीक
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है? अब इसके अंतर्गत बहुत सारे प्रोसीजर्स
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शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत बहुत सारी
(00:01:00)
चीजें शामिल होती हैं। और इस प्रक्रिया
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में पहला नंबर पे जो स्टेप होता है वो
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होता है डिफाइन द पर्पस ऑफ़ टेस्ट। यानी कि
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उद्देश्य को डिफाइन करना रहता है।
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उद्देश्य को आइडेंटिफाई करना रहता है कि
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हम टेस्ट को किस लिए डिज़ाइन कर रहे हैं?
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क्या उद्देश्य है? क्यों उस चीज को हम
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लोगों को मेजर करना है। क्यों उस चीज को
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डिज़ाइन करना है? सो फर्स्ट मतलब कि स्टेप
(00:01:25)
जो होता है इसके अंतर्गत टेस्ट
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कंस्ट्रक्शंस का फर्स्ट स्टेप जो होता है
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वो होता है डिफाइन द पर्पस ऑफ़ द टेस्ट।
(00:01:32)
दूसरा होता है डिफाइन द कंस्ट्रक्ट। यानी
(00:01:35)
कि उस कंस्ट्रक्ट को डिफाइन करना रहता है।
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यानी कि आप किस मानसिक गुण को मापना चाहते
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हैं। लाइक अ सेल्फ स्ट्रीम, इंटेलिजेंस,
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स्ट्रेस। किस आपसे किस साइकोलॉजिकल
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प्रॉपर्टी को आप मापना चाहते हैं। ठीक है?
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तो दूसरे नंबर पे डिफाइन किया जाता है इस
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चीज को। थर्ड स्टेप इसमें आ जाता है
(00:01:52)
डिसाइड द टेस्ट फॉर्मेट कि टेस्ट फॉर्मेट
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कौन सा रहेगा आपका ऑब्जेक्टिव टेस्ट
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फॉर्मेट रहेगा सब्जेक्टिव रहेगा लिकट
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रहेगा एमसीक्यूस रहेगा तो आपको इसमें से
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किसी एक टेस्ट फॉर्मेट को सेलेक्ट करना
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रहेगा जिसमें आपका जो रिसर्च है वो
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एग्जीक्यूट किया जाएगा ठीक है
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और इसका नेक्स्ट स्टेप जो होता है आइटम
(00:02:14)
राइटिंग आइटम राइटिंग को तैयार करना रहता
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है क्लियर रिलेवेंट अनबायस आइटम को तैयार
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करना। यानी कि अब इस आइटम के अंतर्गत
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क्या-क्या चीजों को आप रखना चाहते हैं वो
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सारी चीजें कौन-कौन से क्वेश्चंस रखेंगे
(00:02:29)
आप वो सारी चीजें इसके अंतर्गत रहेगा और
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इवन आइटम रहेगा कि सिंगल आइडिया पर आइटम
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रहेगा। ठीक है? तो इस चीज का निर्धारण
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आपको चौथे स्टेप में करना रहता है जिसे हम
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कहते हैं आइटम राइटिंग। फिफ्थ स्टेप इसके
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अंतर्गत जो होता है आइटम एनालिसिस। यानी
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कि जो आइटम आप डिजाइन किए हैं, जिस भी
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साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को मेजर करने के
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लिए उस चीज को एनालिसिस करना है। ठीक है?
(00:02:53)
अब एनालिसिस करके आप चेक करेंगे कि आप जिस
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चीज को मेजर करना चाहते हैं वही चीज
(00:02:58)
एक्चुअली मेजर कर रहा है कि नहीं करेगा
(00:03:01)
आगे आने वाले समय में। इसके दो लेवल होते
(00:03:04)
हैं एनालिसिस करने का। पहला होता है
(00:03:06)
डिफिकल्टी इंडेक्स जिसके अंतर्गत पी
(00:03:08)
वैल्यू होता है और दूसरा होता है
(00:03:10)
डिस्क्रिमिनेशन इंडेक्स जिसे हम डी वैल्यू
(00:03:13)
कहते हैं। आगे इस चीज को एक्सप्लोर
(00:03:14)
करेंगे। नेक्स्ट स्टेप जो होता है
(00:03:17)
स्टैंडर्डाइजेशन यानी कि इसके अंतर्गत
(00:03:19)
आपको नॉर्म्स को
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डिसाइड करना पड़ेगा। रिलायबिलिटी को देखना
(00:03:24)
पड़ेगा। वैलिडिटी को देखना पड़ेगा। ये
(00:03:26)
सारी चीजें इसके अंतर्गत देखनी पड़ेगी।
(00:03:28)
होगा और लास्ट जो इसके अंतर्गत स्टेप होता
(00:03:31)
है वो होता है फाइनल फाइनललाइजेशन एंड
(00:03:34)
एडमिनिस्ट्रेशन यानी फाइनल टेस्ट वर्जन को
(00:03:36)
तैयार करें और इंस्ट्रशंस स्कोरिंग मैनुअल
(00:03:40)
को तैयार करना इसके अंतर्गत शामिल होता
(00:03:42)
है। ठीक है? तो कभी-कभी सीक्वेंस बेस्ड
(00:03:45)
क्वेश्चन आ जाते हैं यहां पे कि आपको
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सीक्वेंस में लगाने के लिए दे दिया जाता
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है कि कौन सा सीक्वेंस सही है। ठीक है? तो
(00:03:51)
आप याद रखिएगा टेस्ट कंस्ट्रक्शंस में
(00:03:54)
बेसिकली जो इसका स्टेप होता है वो इसी
(00:03:57)
ऑर्डर में चलता है। ठीक है? यानी कि
(00:03:59)
फर्स्ट स्टेप इसके अंतर्गत हो जाए डिफाइन
(00:04:01)
द पर्पस ऑफ द टेस्ट एंड सेकंड डिफाइन द
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कंस्ट्रक्ट एंड थर्ड डिसाइड द टेस्ट
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फॉर्मेट एंड फोर्थ आइटम जो होता है आइटम
(00:04:09)
राइटिंग एंड फिफ्थ आइटम एनालिसिस। एंड
(00:04:12)
सिक्स्थ जो होता है स्टैंडर्डाइजेशन एंड
(00:04:15)
सेवन स्टेप और लास्ट स्टेप जो होता है
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इसके अंतर्गत होता है फाइनललाइजेशन एंड
(00:04:19)
एडमिनिस्ट्रेशन। यानी कि फाइनल टेस्ट
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वर्जन को तैयार करना। ठीक है? तो ये होता
(00:04:24)
है आपका टेस्ट कंस्ट्रक्शन। तो आप सिंपल
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तरीके से आप समझ गए होंगे कि टेस्ट
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कंस्ट्रक्शन क्या है? तो टेस्ट
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कंस्ट्रक्शन एक ऐसी प्रक्रिया होती है
(00:04:31)
जिसमें हम उस सारे आइटम्स तैयार करते हैं
(00:04:34)
जिसमें जिस साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को हम
(00:04:35)
मेजर करने की तैयारी कर रहे हैं। ठीक है?
(00:04:39)
और इसके अंतर्गत ये जनरली सेवन स्टेप्स
(00:04:42)
होते हैं। ठीक है? अब हम लोग डिस्कस
(00:04:45)
करेंगे कि आइटम राइटिंग क्या होता है? कि
(00:04:48)
ये डिटेल में दिया है सिलेबस के अंतर्गत।
(00:04:50)
इस चीज को हम लोगों को डिस्कस करना होगा
(00:04:52)
कि आइटम राइटिंग क्या होता है और अक्सर
(00:04:53)
यहां से क्वेश्चंस पूछे जाते हैं। तो आइटम
(00:04:55)
राइटिंग का मतलब मतलब समझिए कि आइटम
(00:04:58)
राइटिंग इज द प्रोसेस ऑफ़ क्रिएटिंग टेस्ट
(00:05:00)
आइटम और क्वेश्चंस। यानी कि टेस्ट आइटम और
(00:05:03)
क्वेश्चंस को तैयार करने का एक प्रोसेस
(00:05:05)
होता है। क्रिएट करने का एक प्रोसेस होता
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है। दैट एक्यूरेटली मेजर स्पेसिफिक
(00:05:10)
साइकोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट। यानी कि जो
(00:05:12)
एक्यूरेटली मेजर करे आपकी स्पेसिफिक
(00:05:15)
साइकोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट को सच एज
(00:05:17)
इंटेलिजेंस, पर्सनालिटी, ऐपटीट्यूड। ठीक
(00:05:20)
है? तो आप जिस भी साइकोलॉजिकल साइकोलॉजिकल
(00:05:23)
ट्रेड्स को नापना चाहते हैं, जिस भी
(00:05:24)
साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को नापना चाहते हैं
(00:05:26)
तो उसी के अकॉर्डिंग आपको आइटम राइटिंग
(00:05:28)
करना होगा। यानी कि उसमें जो क्वेश्चंस
(00:05:30)
होंगे जो ठीक है? जो उसमें टेस्ट आइटम्स
(00:05:33)
होंगे वो उसी से रिलेटेड होने चाहिए। अगर
(00:05:36)
आप मान के चलते हैं इंटेलिजेंस को टेस्ट
(00:05:38)
करना चाहते हैं तो इंटेलिजेंस के आइटम्स
(00:05:40)
अलग होंगे। पर्सनालिटी को टेस्ट करना
(00:05:42)
चाहते हैं तो उसके टेस्ट आइटम्स और
(00:05:44)
क्वेश्चन सब अलग होंगे। उसी तरीके से
(00:05:46)
ऐपटीट्यूड को टेस्ट करना चाहते हैं तो
(00:05:47)
इसके आइटम्स एंड प्रॉपर्टी सब अलग-अलग
(00:05:49)
होंगे। तो आप समझिए कि आइटम राइटिंग के
(00:05:52)
अंतर्गत क्या होता है? सो आइटम राइटिंग एक
(00:05:54)
ऐसी प्रक्रिया होती है जिसके अंतर्गत
(00:05:57)
टेस्ट आइटम को क्वेश्चंस को क्रिएट किया
(00:05:59)
जाता है ताकि जो स्पेसिफिक साइकोलॉजिकल
(00:06:02)
कंस्ट्रक्ट्स को स्पेसिफिक साइकोलॉजिकल
(00:06:05)
टेप को एक्यूरेटली मेजर किया जा सके। ठीक
(00:06:08)
है? तो ये चीज होता है। अब नेक्स्ट हम लोग
(00:06:12)
डिस्कस करते हैं कि आइटम राइटिंग की जरूरत
(00:06:14)
जरूरी बातें कौन-कौन सी है? गाइडलाइन
(00:06:16)
इसमें कौन-कौन से फॉलो किए जाते हैं? तो
(00:06:17)
आप सिंपल समझिए कि देखिए कोई भी टेस्ट
(00:06:20)
आइटम्स हो जाता है, कोई भी क्वेश्चंस हो
(00:06:22)
जाते हैं तो कुछ कॉमन चीजें उसके अंतर्गत
(00:06:24)
देखी जाती है। जैसे मान के चलिए क्लेरिटी
(00:06:26)
यानी कि एकदम स्पष्ट होना चाहिए। सरल भाषा
(00:06:29)
में होना चाहिए ताकि जो वहां पे लोग बैठे
(00:06:31)
हैं उनको समझ में आ जाए। यानी कि जो
(00:06:32)
पेशेंट है या जो इस देने वाले जो
(00:06:35)
पार्टिसिपेंट्स हैं उनको समझ में आ जाए।
(00:06:37)
ठीक है? रिलेवेंस होना चाहिए, प्रासंगिक
(00:06:39)
होना चाहिए। यानी कि आइटम उसी साइकोलॉजिकल
(00:06:41)
ट्रेड से जुड़ा हो जिसे आप मापना चाहते
(00:06:43)
हैं। ऐसा ना हो कि आप पर्सनालिटी को मापना
(00:06:46)
चाहते हैं और आपका जो टेस्ट आइटम है वो
(00:06:48)
इंटेलिजेंस की ओर आगे बढ़ रहा है।
(00:06:49)
ऐपटीट्यूड की ओर आगे बढ़ रहा है। नहीं ऐसा
(00:06:51)
नहीं होना चाहिए। रिलेवेंस होना चाहिए या
(00:06:53)
प्रसंगिक होना चाहिए। यानी कि जिस भी
(00:06:55)
साइकोलॉजिकल ट्रे को आप नापना चाहते हैं,
(00:06:56)
जिस भी साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को आप मेजर
(00:06:58)
करना चाहते हैं वो दिस आइटम उसी
(00:07:01)
साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को मेजर करने के
(00:07:03)
लिए या उसी डायरेक्शन में आगे बढ़ने बढ़ने
(00:07:06)
चाहिए। ठीक है? नेक्स्ट है वन आईडिया पर
(00:07:09)
आइटम यानी कि एक समय में एक बार। ऐसा तो
(00:07:11)
नहीं है कि आपका जो साइकोलॉजिकल टेस्ट है
(00:07:13)
कि वो क्लीयरेंस ही नहीं कर पा रहा है कि
(00:07:15)
एक बार में कितने क्वेश्चंस वहां पे जा
(00:07:17)
रहे हैं। तो बेस्ट इसमें जो होता है वो
(00:07:19)
होता है वन आईडिया पर आइटम। यानी कि डबल
(00:07:22)
बैरल क्वेश्चंस नहीं होना चाहिए। यानी कि
(00:07:25)
वहां पे ज्यादा फजीनेस नहीं होना चाहिए।
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क्वेश्चन में क्लियर होना चाहिए और वन
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आईडिया पर आइटम्स होने चाहिए। यानी कि एक
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बार में एक ही आईडिया को रिप्रेजेंट करना
(00:07:33)
चाहिए। अवॉयड बायस यानी पूर्वाग्रह से
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बचना चाहिए। कल्चर, जेंडर, लैंग्वेज से
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बचना चाहिए। बैलेंस्ड वर्डिंग यानी कि
(00:07:41)
पॉजिटिव और नेगेटिव स्टेटमेंट्स का संतुलन
(00:07:43)
होना चाहिए इसके अंतर्गत और एप्रोप्रियट
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रिस्पांस फॉर्मेट जैसे मल्टीपल चॉइस हो
(00:07:48)
गया, लिकट हो गया, यस नो आदि के फॉर्मेट
(00:07:50)
में भी एंट्रो वहां पे लिया जाना चाहिए।
(00:07:53)
तो आप समझिए कि आइटम राइटिंग की जो जरूरी
(00:07:55)
गाइडलाइंस होती है नंबर फर्स्ट से
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क्लेरिटी होती है। रिलेवेंस होता है। वन
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आईडिया पर आइटम्स होते हैं। अवॉइड बायस
(00:08:01)
होता है। बैलेंस बोर्डिंग होता है एंड
(00:08:04)
एप्रोप्रियट रिस्पांस फॉर्मेट होने चाहिए।
(00:08:06)
तब जाकर के आपका जो आइटम होगा टेस्ट आइटम
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होगा वो एक बेहतर तरीके से डिजाइन होगा और
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उस साइकोलॉजिकल टेस्ट को मेजर करेगा जिसे
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एक्चुअली और एक्यूरेटली आप मेजर करना
(00:08:16)
चाहते हैं। ठीक? अब आइटम राइटिंग क्यों
(00:08:19)
जरूरी होता है? इस चीज को समझना जरूरी।
(00:08:21)
कभी-कभी डायरेक्ट एग्जाम में यहां पे यहां
(00:08:23)
से क्वेश्चंस आ जाते हैं। एग्जांपल फॉर्म
(00:08:26)
में पूछ दिया जाता है इस चीज को। आगे हम
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लोग जब एमसीक्यू प्रैक्टिस करेंगे तो इस
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चीज को समझेंगे। समझिए कि जब आइटम राइटिंग
(00:08:32)
क्यों जरूरत है? ताकि टेस्ट साइंटिफिक और
(00:08:34)
रिलायबल हो। ठीक है? यानी कि उसको एक
(00:08:36)
तरीके से एक फ्रेम में डिजाइन किया जा
(00:08:38)
सके। साइंटिफिक हो। गलत या अनक्लियर आइटम
(00:08:41)
से रिजल्ट में एरर आ सकता है। इसलिए वहां
(00:08:43)
पर एकदम क्लियर आइटम्स को तैयार किया जाता
(00:08:45)
है। और वैलिडिटी और रिलायबिलिटी दोनों
(00:08:47)
डायरेक्टली आइटम क्वालिटी पे डिपेंड करते
(00:08:49)
हैं। यानी कि जिस तरीके से आइटम की
(00:08:51)
क्वालिटी होगी जितनी एफिशिएंट आइटम
(00:08:53)
क्वालिटी होगी, जितनी एफिशिएंसी आपका
(00:08:55)
क्वेश्चन क्वालिटी होगा, उसी हिसाब से
(00:08:58)
टेस्ट की वैलिडिटी और रिलायबिलिटी दोनों
(00:09:00)
पे ही डिपेंड करता है। दोनों इसी चीज़ पे
(00:09:02)
डिपेंड करेगी। तो, यहां पे क्या होता है
(00:09:04)
कि डायरेक्टली आइटम क्वालिटी पे क्या होता
(00:09:06)
है? वैलिडिटी और रिलायबिलिटी डिपेंड करता
(00:09:08)
है रिसर्च की। ठीक है? आइए हम सिर्फ इसको
(00:09:12)
डिस्कस करेंगे इसमें। अब हम बात करेंगे अब
(00:09:14)
आइटम एनालिसिस क्या होता है? ठीक है? तो
(00:09:17)
आइटम एनालिसिस एक्चुअली क्या होता है?
(00:09:19)
एनालिसिस के जरिए हम उस चीज का अध्ययन
(00:09:21)
करते हैं। सो आइटम एनालिसिस एक
(00:09:23)
स्टैटिस्टिकल प्रोसेस है जिसमें पता लगता
(00:09:26)
है कि कोई आइटम या कोई टेस्ट आइटम
(00:09:29)
क्वेश्चंस कितना अच्छा काम कर रहा है। ठीक
(00:09:32)
है? कितना अच्छा काम कर रहा है। आइटम
(00:09:34)
एनालिसिस एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें हम
(00:09:36)
प्रश्न आइटम को यह देखते हैं। देखने के
(00:09:38)
लिए एनालाइज करते हैं कि वह कितना आसान या
(00:09:41)
कठिन है। वह अच्छे और कमजोर छात्रों के
(00:09:44)
बीच फर्क कर पा रहा है कि नहीं कर पा रहा
(00:09:46)
है। इसलिए हम आइटम एनालिसिस करते हैं। ठीक
(00:09:49)
है? तो आइटम एनालिसिस जो होता है पॉजिटिव
(00:09:52)
नेगेटिव के बीच में डिस्क्रि
(00:09:53)
डिस्क्रिमिनेशन के लिए यूज़फुल हो सकता है।
(00:09:55)
आसान और कठिन के बीच में डिस्क्रिमिनेशन
(00:09:58)
करने के लिए यूज़फुल हो सकता है। अच्छे और
(00:10:00)
कमजोर छात्रों के बीच में जो फर्क है वो
(00:10:02)
करने के लिए हम लोग इसका इस्तेमाल कर सकते
(00:10:04)
हैं। तो सिंपल आप आइटम एनालिसिस को समझिए
(00:10:07)
कि हम उन सारे आइटम्स को टेस्ट आइटम
(00:10:10)
आइटम्स को टेस्ट क्वेश्चंस को एनालिसिस
(00:10:12)
करते हैं ताकि यह समझ सके वो कितने अच्छे
(00:10:14)
से काम करेगा। ठीक है? उसकी जो प्रॉपर्टीज
(00:10:17)
है वो रेलेवेंस होने चाहिए। ठीक है? तो
(00:10:20)
आइटम एनालिसिस
(00:10:22)
ये होता है। सब आइटम एनालिसिस के मुख्य
(00:10:25)
उद्देश्य क्या होते हैं? खराब आइटम को
(00:10:28)
पहचान करके उसे हटाना यानी कि जो यूज़फुल
(00:10:30)
नहीं है उसको क्या करना? साइड कर देना।
(00:10:32)
दूसरा वैलिड एंड रिलायबल टेस्ट को तैयार
(00:10:34)
करना। ठीक है? वैलिड और रिलायबल टेस्ट
(00:10:36)
रहेगा। तैयार करना होता है। हर प्रश्न की
(00:10:39)
क्वालिटी को साइंटिफिक तरीके से मेजर करना
(00:10:41)
भी इसका उद्देश्य होता है टर्म एनालिसिस
(00:10:44)
का। ठीक? अब टाइप ऑफ आइटम एनालिसिस की बात
(00:10:46)
करते हैं। तो टाइप ऑफ आइटम आइटम एनालिसिस
(00:10:49)
में पहला होता है आइटम डिफिकल्टी इंडेक्स
(00:10:52)
जिसे हम पी वैल्यू के इससे जानते हैं। ठीक
(00:10:55)
है? तो इसका जो फार्मूला होता है ये बताता
(00:10:57)
है कि किसी आइटम को कितने प्रतिशत लोगों
(00:11:01)
ने सही किया है। तो इसको फार्मूला आप याद
(00:11:03)
करिएगा कि P = करेक्ट रिस्पांस डिवाइडेड
(00:11:06)
बाय टोटल रिस्पांस। ठीक है? अब इसमें जो P
(00:11:10)
की वैल्यू जो होती है 0.09 बहुत आसान
(00:11:13)
प्रश्न है। आएगी तो यह या आप इंटरप्रेट कर
(00:11:15)
सकते हैं। अगर पी की वैल्यू 0.20 आता है
(00:11:18)
तो बहुत कठिन प्रश्न है। सिर्फ 20% ने ही
(00:11:20)
सही किया और आइडियल पी वैल्यू जो होती है
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वो 0.30 से 0.70 के बीच में होती है।
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कभी-कभी यहां से भी डायरेक्ट क्वेश्चन आ
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जाता है कि आइटम डिफिकल्टी इंडेक्स में जो
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आइडियल वैल्यू होती है वो कितना होता है?
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तो वहां पे ऑप्शंस दिया रहेगा। ये ऑप्शन
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अगर आपको कहीं पे भी दिखता है तो आप इस
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चीज को सिंपली पुट कर सकते हैं। ठीक है?
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अब दूसरा होता है आइटम डिस्क्रिमिनेशन
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इंडेक्स जिसे हम डी वैल्यू से रिप्रेजेंट
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करते हैं। तो इसका फार्मूला होता है डी
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वैल्यू ये दिखाता है कि कोई आइटम हाई
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स्कोरर लो स्कोरर के बीच कितनी अच्छी तरह
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से वर्क कर सकता है। ठीक है? ठीक है? यानी
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कि हाई स्कोरर जो है और लो स्कोरर जो है
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उनके बीच में कितना अच्छे से डिफरेंस कर
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सकता है इस चीज को रिप्रेजेंट करता है। तो
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यहां पे जो इसका डी इक्वल टू होता है RH -
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RL यानी कि हाई स्कोरर हो जाता है। लो
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स्कोर हो अप N तो आर एच जो होता है टॉप
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27% शो होता है। ग्रुप में करेक्ट आंसर्स
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होते हैं। यानी कि ऊपर से टॉप 20% 27% और
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आर्य जो होता है बॉटम से बॉटम से 27%
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ग्रुप में करेक्ट आंसर यानी बॉटम से जितने
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लोग भी मतलब इसका एक किए होंगे वो इसके
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अंतर्गत आ जाएगा और n = ईच ग्रुप का टोटल
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नंबर कितना कितना है? तो यह हो जाता है।
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इसका इंटरप्रिटेशन यह है कि अगर d की
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वैल्यू +1 के करीब आती है तो परफेक्ट
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डिस्क्रिमिनेशन को रिप्रेजेंट कर रहा है।
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अगर d की वैल्यू जीरो आती है तो कोई फर्क
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नहीं कर रहा है। यानी कि नो यूज़फुल अगर d
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इज स्मॉलर देन ज़ीरो हो जा रहा है तो अगर
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गलत आइटम है रिजेक्ट एंड रिवाइज की जरूरत
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है उस चीज को। ठीक है? तो आप इस चीज को भी
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याद रखिए। कभी-कभी यहां से भी डायरेक्ट
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एमसीक्यूस आ जाते हैं एग्जाम में। ओके? सो
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गाइस आज के इस एपिसोड में बस हम लोग इतना
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ही रखते हैं और नेक्स्ट एपिसोड में हम लोग
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इसी से रिलेटेड एमसीक्यूस को डिस्कस
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करेंगे ताकि ये सारे कांसेप्ट क्लियर होते
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चले जाए। ठीक है? तो आज के इस एपिसोड में
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बस इतना ही रखते हैं। मिलते हैं नेक्स्ट
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एपिसोड में। कीप साइनिंग गाइस। बाय बाय।
