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Test Construction in Psychology | Process, Item Writing & Item Analysis | UGC NET Masterclass (YouTube Video Transcript)

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Title: Test Construction in Psychology | Process, Item Writing & Item Analysis | UGC NET Masterclass
Duration: 00:13:12
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(00:00:00) Your YouTube transcript will appear here (00:00:00) सो हेलो स्टूडेंट्स। स्वागत है आप सभी का (00:00:03) एक नए एपिसोड में एक नए लेक्चर में। सो आज (00:00:06) के इस एपिसोड में हम लोग डिस्कस करने वाले (00:00:08) हैं टेस्ट कंस्ट्रक्शन। टेस्ट (00:00:10) कंस्ट्रक्शंस क्या होता है? इसके बारे में (00:00:13) हम लोग डिस्कस करेंगे और आइटम राइटिंग और (00:00:15) आइटम एनालिसिस क्या होता है? इसके अंतर्गत (00:00:18) इस चीज को एक इस एपिसोड में हम लोग (00:00:20) एक्सप्लोर करने वाले हैं। ठीक है? अब हम (00:00:23) लोग आगे बढ़ते हैं और डिस्कस करते हैं। तो (00:00:25) अगर आप कोच नीतीश कुमार चैनल पर नए हैं तो (00:00:28) नीतीश कुमार चैनल को सब्सक्राइब कर (00:00:29) दीजिएगा। वीडियो को लाइक कर दीजिएगा और (00:00:31) दोस्तों के पास शेयर भी कर दीजिएगा। ठीक (00:00:33) है? अब हम लोग आगे बढ़ते हैं और डिस्कस (00:00:35) करते हैं कि टेस्ट कंस्ट्रक्शंस होता क्या (00:00:38) है? सो समझिए कि टेस्ट कंस्ट्रक्शन का (00:00:40) मतलब ये होता है कि टेस्ट को बनाने की एक (00:00:43) प्रक्रिया होती है जिसमें हम टेस्ट को (00:00:45) बनाते हैं। सो साइकोलॉजिकल टेस्ट को (00:00:47) साइंटिफिकली और सिस्टमैटिकली डेवलप करने (00:00:50) की जो प्रक्रिया होती है वही होता है क्या (00:00:52) आपका टेस्ट कंस्ट्रक्शन कहलाता है। ठीक (00:00:55) है? अब इसके अंतर्गत बहुत सारे प्रोसीजर्स (00:00:58) शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत बहुत सारी (00:01:00) चीजें शामिल होती हैं। और इस प्रक्रिया (00:01:03) में पहला नंबर पे जो स्टेप होता है वो (00:01:05) होता है डिफाइन द पर्पस ऑफ़ टेस्ट। यानी कि (00:01:09) उद्देश्य को डिफाइन करना रहता है। (00:01:11) उद्देश्य को आइडेंटिफाई करना रहता है कि (00:01:13) हम टेस्ट को किस लिए डिज़ाइन कर रहे हैं? (00:01:17) क्या उद्देश्य है? क्यों उस चीज को हम (00:01:20) लोगों को मेजर करना है। क्यों उस चीज को (00:01:21) डिज़ाइन करना है? सो फर्स्ट मतलब कि स्टेप (00:01:25) जो होता है इसके अंतर्गत टेस्ट (00:01:27) कंस्ट्रक्शंस का फर्स्ट स्टेप जो होता है (00:01:29) वो होता है डिफाइन द पर्पस ऑफ़ द टेस्ट। (00:01:32) दूसरा होता है डिफाइन द कंस्ट्रक्ट। यानी (00:01:35) कि उस कंस्ट्रक्ट को डिफाइन करना रहता है। (00:01:37) यानी कि आप किस मानसिक गुण को मापना चाहते (00:01:39) हैं। लाइक अ सेल्फ स्ट्रीम, इंटेलिजेंस, (00:01:43) स्ट्रेस। किस आपसे किस साइकोलॉजिकल (00:01:45) प्रॉपर्टी को आप मापना चाहते हैं। ठीक है? (00:01:48) तो दूसरे नंबर पे डिफाइन किया जाता है इस (00:01:50) चीज को। थर्ड स्टेप इसमें आ जाता है (00:01:52) डिसाइड द टेस्ट फॉर्मेट कि टेस्ट फॉर्मेट (00:01:55) कौन सा रहेगा आपका ऑब्जेक्टिव टेस्ट (00:01:57) फॉर्मेट रहेगा सब्जेक्टिव रहेगा लिकट (00:01:59) रहेगा एमसीक्यूस रहेगा तो आपको इसमें से (00:02:02) किसी एक टेस्ट फॉर्मेट को सेलेक्ट करना (00:02:05) रहेगा जिसमें आपका जो रिसर्च है वो (00:02:08) एग्जीक्यूट किया जाएगा ठीक है (00:02:11) और इसका नेक्स्ट स्टेप जो होता है आइटम (00:02:14) राइटिंग आइटम राइटिंग को तैयार करना रहता (00:02:17) है क्लियर रिलेवेंट अनबायस आइटम को तैयार (00:02:21) करना। यानी कि अब इस आइटम के अंतर्गत (00:02:24) क्या-क्या चीजों को आप रखना चाहते हैं वो (00:02:27) सारी चीजें कौन-कौन से क्वेश्चंस रखेंगे (00:02:29) आप वो सारी चीजें इसके अंतर्गत रहेगा और (00:02:33) इवन आइटम रहेगा कि सिंगल आइडिया पर आइटम (00:02:36) रहेगा। ठीक है? तो इस चीज का निर्धारण (00:02:38) आपको चौथे स्टेप में करना रहता है जिसे हम (00:02:40) कहते हैं आइटम राइटिंग। फिफ्थ स्टेप इसके (00:02:42) अंतर्गत जो होता है आइटम एनालिसिस। यानी (00:02:45) कि जो आइटम आप डिजाइन किए हैं, जिस भी (00:02:47) साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को मेजर करने के (00:02:49) लिए उस चीज को एनालिसिस करना है। ठीक है? (00:02:53) अब एनालिसिस करके आप चेक करेंगे कि आप जिस (00:02:56) चीज को मेजर करना चाहते हैं वही चीज (00:02:58) एक्चुअली मेजर कर रहा है कि नहीं करेगा (00:03:01) आगे आने वाले समय में। इसके दो लेवल होते (00:03:04) हैं एनालिसिस करने का। पहला होता है (00:03:06) डिफिकल्टी इंडेक्स जिसके अंतर्गत पी (00:03:08) वैल्यू होता है और दूसरा होता है (00:03:10) डिस्क्रिमिनेशन इंडेक्स जिसे हम डी वैल्यू (00:03:13) कहते हैं। आगे इस चीज को एक्सप्लोर (00:03:14) करेंगे। नेक्स्ट स्टेप जो होता है (00:03:17) स्टैंडर्डाइजेशन यानी कि इसके अंतर्गत (00:03:19) आपको नॉर्म्स को (00:03:21) डिसाइड करना पड़ेगा। रिलायबिलिटी को देखना (00:03:24) पड़ेगा। वैलिडिटी को देखना पड़ेगा। ये (00:03:26) सारी चीजें इसके अंतर्गत देखनी पड़ेगी। (00:03:28) होगा और लास्ट जो इसके अंतर्गत स्टेप होता (00:03:31) है वो होता है फाइनल फाइनललाइजेशन एंड (00:03:34) एडमिनिस्ट्रेशन यानी फाइनल टेस्ट वर्जन को (00:03:36) तैयार करें और इंस्ट्रशंस स्कोरिंग मैनुअल (00:03:40) को तैयार करना इसके अंतर्गत शामिल होता (00:03:42) है। ठीक है? तो कभी-कभी सीक्वेंस बेस्ड (00:03:45) क्वेश्चन आ जाते हैं यहां पे कि आपको (00:03:46) सीक्वेंस में लगाने के लिए दे दिया जाता (00:03:48) है कि कौन सा सीक्वेंस सही है। ठीक है? तो (00:03:51) आप याद रखिएगा टेस्ट कंस्ट्रक्शंस में (00:03:54) बेसिकली जो इसका स्टेप होता है वो इसी (00:03:57) ऑर्डर में चलता है। ठीक है? यानी कि (00:03:59) फर्स्ट स्टेप इसके अंतर्गत हो जाए डिफाइन (00:04:01) द पर्पस ऑफ द टेस्ट एंड सेकंड डिफाइन द (00:04:03) कंस्ट्रक्ट एंड थर्ड डिसाइड द टेस्ट (00:04:06) फॉर्मेट एंड फोर्थ आइटम जो होता है आइटम (00:04:09) राइटिंग एंड फिफ्थ आइटम एनालिसिस। एंड (00:04:12) सिक्स्थ जो होता है स्टैंडर्डाइजेशन एंड (00:04:15) सेवन स्टेप और लास्ट स्टेप जो होता है (00:04:17) इसके अंतर्गत होता है फाइनललाइजेशन एंड (00:04:19) एडमिनिस्ट्रेशन। यानी कि फाइनल टेस्ट (00:04:21) वर्जन को तैयार करना। ठीक है? तो ये होता (00:04:24) है आपका टेस्ट कंस्ट्रक्शन। तो आप सिंपल (00:04:26) तरीके से आप समझ गए होंगे कि टेस्ट (00:04:28) कंस्ट्रक्शन क्या है? तो टेस्ट (00:04:29) कंस्ट्रक्शन एक ऐसी प्रक्रिया होती है (00:04:31) जिसमें हम उस सारे आइटम्स तैयार करते हैं (00:04:34) जिसमें जिस साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को हम (00:04:35) मेजर करने की तैयारी कर रहे हैं। ठीक है? (00:04:39) और इसके अंतर्गत ये जनरली सेवन स्टेप्स (00:04:42) होते हैं। ठीक है? अब हम लोग डिस्कस (00:04:45) करेंगे कि आइटम राइटिंग क्या होता है? कि (00:04:48) ये डिटेल में दिया है सिलेबस के अंतर्गत। (00:04:50) इस चीज को हम लोगों को डिस्कस करना होगा (00:04:52) कि आइटम राइटिंग क्या होता है और अक्सर (00:04:53) यहां से क्वेश्चंस पूछे जाते हैं। तो आइटम (00:04:55) राइटिंग का मतलब मतलब समझिए कि आइटम (00:04:58) राइटिंग इज द प्रोसेस ऑफ़ क्रिएटिंग टेस्ट (00:05:00) आइटम और क्वेश्चंस। यानी कि टेस्ट आइटम और (00:05:03) क्वेश्चंस को तैयार करने का एक प्रोसेस (00:05:05) होता है। क्रिएट करने का एक प्रोसेस होता (00:05:07) है। दैट एक्यूरेटली मेजर स्पेसिफिक (00:05:10) साइकोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट। यानी कि जो (00:05:12) एक्यूरेटली मेजर करे आपकी स्पेसिफिक (00:05:15) साइकोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट को सच एज (00:05:17) इंटेलिजेंस, पर्सनालिटी, ऐपटीट्यूड। ठीक (00:05:20) है? तो आप जिस भी साइकोलॉजिकल साइकोलॉजिकल (00:05:23) ट्रेड्स को नापना चाहते हैं, जिस भी (00:05:24) साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को नापना चाहते हैं (00:05:26) तो उसी के अकॉर्डिंग आपको आइटम राइटिंग (00:05:28) करना होगा। यानी कि उसमें जो क्वेश्चंस (00:05:30) होंगे जो ठीक है? जो उसमें टेस्ट आइटम्स (00:05:33) होंगे वो उसी से रिलेटेड होने चाहिए। अगर (00:05:36) आप मान के चलते हैं इंटेलिजेंस को टेस्ट (00:05:38) करना चाहते हैं तो इंटेलिजेंस के आइटम्स (00:05:40) अलग होंगे। पर्सनालिटी को टेस्ट करना (00:05:42) चाहते हैं तो उसके टेस्ट आइटम्स और (00:05:44) क्वेश्चन सब अलग होंगे। उसी तरीके से (00:05:46) ऐपटीट्यूड को टेस्ट करना चाहते हैं तो (00:05:47) इसके आइटम्स एंड प्रॉपर्टी सब अलग-अलग (00:05:49) होंगे। तो आप समझिए कि आइटम राइटिंग के (00:05:52) अंतर्गत क्या होता है? सो आइटम राइटिंग एक (00:05:54) ऐसी प्रक्रिया होती है जिसके अंतर्गत (00:05:57) टेस्ट आइटम को क्वेश्चंस को क्रिएट किया (00:05:59) जाता है ताकि जो स्पेसिफिक साइकोलॉजिकल (00:06:02) कंस्ट्रक्ट्स को स्पेसिफिक साइकोलॉजिकल (00:06:05) टेप को एक्यूरेटली मेजर किया जा सके। ठीक (00:06:08) है? तो ये चीज होता है। अब नेक्स्ट हम लोग (00:06:12) डिस्कस करते हैं कि आइटम राइटिंग की जरूरत (00:06:14) जरूरी बातें कौन-कौन सी है? गाइडलाइन (00:06:16) इसमें कौन-कौन से फॉलो किए जाते हैं? तो (00:06:17) आप सिंपल समझिए कि देखिए कोई भी टेस्ट (00:06:20) आइटम्स हो जाता है, कोई भी क्वेश्चंस हो (00:06:22) जाते हैं तो कुछ कॉमन चीजें उसके अंतर्गत (00:06:24) देखी जाती है। जैसे मान के चलिए क्लेरिटी (00:06:26) यानी कि एकदम स्पष्ट होना चाहिए। सरल भाषा (00:06:29) में होना चाहिए ताकि जो वहां पे लोग बैठे (00:06:31) हैं उनको समझ में आ जाए। यानी कि जो (00:06:32) पेशेंट है या जो इस देने वाले जो (00:06:35) पार्टिसिपेंट्स हैं उनको समझ में आ जाए। (00:06:37) ठीक है? रिलेवेंस होना चाहिए, प्रासंगिक (00:06:39) होना चाहिए। यानी कि आइटम उसी साइकोलॉजिकल (00:06:41) ट्रेड से जुड़ा हो जिसे आप मापना चाहते (00:06:43) हैं। ऐसा ना हो कि आप पर्सनालिटी को मापना (00:06:46) चाहते हैं और आपका जो टेस्ट आइटम है वो (00:06:48) इंटेलिजेंस की ओर आगे बढ़ रहा है। (00:06:49) ऐपटीट्यूड की ओर आगे बढ़ रहा है। नहीं ऐसा (00:06:51) नहीं होना चाहिए। रिलेवेंस होना चाहिए या (00:06:53) प्रसंगिक होना चाहिए। यानी कि जिस भी (00:06:55) साइकोलॉजिकल ट्रे को आप नापना चाहते हैं, (00:06:56) जिस भी साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को आप मेजर (00:06:58) करना चाहते हैं वो दिस आइटम उसी (00:07:01) साइकोलॉजिकल प्रॉपर्टी को मेजर करने के (00:07:03) लिए या उसी डायरेक्शन में आगे बढ़ने बढ़ने (00:07:06) चाहिए। ठीक है? नेक्स्ट है वन आईडिया पर (00:07:09) आइटम यानी कि एक समय में एक बार। ऐसा तो (00:07:11) नहीं है कि आपका जो साइकोलॉजिकल टेस्ट है (00:07:13) कि वो क्लीयरेंस ही नहीं कर पा रहा है कि (00:07:15) एक बार में कितने क्वेश्चंस वहां पे जा (00:07:17) रहे हैं। तो बेस्ट इसमें जो होता है वो (00:07:19) होता है वन आईडिया पर आइटम। यानी कि डबल (00:07:22) बैरल क्वेश्चंस नहीं होना चाहिए। यानी कि (00:07:25) वहां पे ज्यादा फजीनेस नहीं होना चाहिए। (00:07:27) क्वेश्चन में क्लियर होना चाहिए और वन (00:07:29) आईडिया पर आइटम्स होने चाहिए। यानी कि एक (00:07:31) बार में एक ही आईडिया को रिप्रेजेंट करना (00:07:33) चाहिए। अवॉयड बायस यानी पूर्वाग्रह से (00:07:35) बचना चाहिए। कल्चर, जेंडर, लैंग्वेज से (00:07:38) बचना चाहिए। बैलेंस्ड वर्डिंग यानी कि (00:07:41) पॉजिटिव और नेगेटिव स्टेटमेंट्स का संतुलन (00:07:43) होना चाहिए इसके अंतर्गत और एप्रोप्रियट (00:07:45) रिस्पांस फॉर्मेट जैसे मल्टीपल चॉइस हो (00:07:48) गया, लिकट हो गया, यस नो आदि के फॉर्मेट (00:07:50) में भी एंट्रो वहां पे लिया जाना चाहिए। (00:07:53) तो आप समझिए कि आइटम राइटिंग की जो जरूरी (00:07:55) गाइडलाइंस होती है नंबर फर्स्ट से (00:07:57) क्लेरिटी होती है। रिलेवेंस होता है। वन (00:07:59) आईडिया पर आइटम्स होते हैं। अवॉइड बायस (00:08:01) होता है। बैलेंस बोर्डिंग होता है एंड (00:08:04) एप्रोप्रियट रिस्पांस फॉर्मेट होने चाहिए। (00:08:06) तब जाकर के आपका जो आइटम होगा टेस्ट आइटम (00:08:08) होगा वो एक बेहतर तरीके से डिजाइन होगा और (00:08:11) उस साइकोलॉजिकल टेस्ट को मेजर करेगा जिसे (00:08:13) एक्चुअली और एक्यूरेटली आप मेजर करना (00:08:16) चाहते हैं। ठीक? अब आइटम राइटिंग क्यों (00:08:19) जरूरी होता है? इस चीज को समझना जरूरी। (00:08:21) कभी-कभी डायरेक्ट एग्जाम में यहां पे यहां (00:08:23) से क्वेश्चंस आ जाते हैं। एग्जांपल फॉर्म (00:08:26) में पूछ दिया जाता है इस चीज को। आगे हम (00:08:27) लोग जब एमसीक्यू प्रैक्टिस करेंगे तो इस (00:08:29) चीज को समझेंगे। समझिए कि जब आइटम राइटिंग (00:08:32) क्यों जरूरत है? ताकि टेस्ट साइंटिफिक और (00:08:34) रिलायबल हो। ठीक है? यानी कि उसको एक (00:08:36) तरीके से एक फ्रेम में डिजाइन किया जा (00:08:38) सके। साइंटिफिक हो। गलत या अनक्लियर आइटम (00:08:41) से रिजल्ट में एरर आ सकता है। इसलिए वहां (00:08:43) पर एकदम क्लियर आइटम्स को तैयार किया जाता (00:08:45) है। और वैलिडिटी और रिलायबिलिटी दोनों (00:08:47) डायरेक्टली आइटम क्वालिटी पे डिपेंड करते (00:08:49) हैं। यानी कि जिस तरीके से आइटम की (00:08:51) क्वालिटी होगी जितनी एफिशिएंट आइटम (00:08:53) क्वालिटी होगी, जितनी एफिशिएंसी आपका (00:08:55) क्वेश्चन क्वालिटी होगा, उसी हिसाब से (00:08:58) टेस्ट की वैलिडिटी और रिलायबिलिटी दोनों (00:09:00) पे ही डिपेंड करता है। दोनों इसी चीज़ पे (00:09:02) डिपेंड करेगी। तो, यहां पे क्या होता है (00:09:04) कि डायरेक्टली आइटम क्वालिटी पे क्या होता (00:09:06) है? वैलिडिटी और रिलायबिलिटी डिपेंड करता (00:09:08) है रिसर्च की। ठीक है? आइए हम सिर्फ इसको (00:09:12) डिस्कस करेंगे इसमें। अब हम बात करेंगे अब (00:09:14) आइटम एनालिसिस क्या होता है? ठीक है? तो (00:09:17) आइटम एनालिसिस एक्चुअली क्या होता है? (00:09:19) एनालिसिस के जरिए हम उस चीज का अध्ययन (00:09:21) करते हैं। सो आइटम एनालिसिस एक (00:09:23) स्टैटिस्टिकल प्रोसेस है जिसमें पता लगता (00:09:26) है कि कोई आइटम या कोई टेस्ट आइटम (00:09:29) क्वेश्चंस कितना अच्छा काम कर रहा है। ठीक (00:09:32) है? कितना अच्छा काम कर रहा है। आइटम (00:09:34) एनालिसिस एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें हम (00:09:36) प्रश्न आइटम को यह देखते हैं। देखने के (00:09:38) लिए एनालाइज करते हैं कि वह कितना आसान या (00:09:41) कठिन है। वह अच्छे और कमजोर छात्रों के (00:09:44) बीच फर्क कर पा रहा है कि नहीं कर पा रहा (00:09:46) है। इसलिए हम आइटम एनालिसिस करते हैं। ठीक (00:09:49) है? तो आइटम एनालिसिस जो होता है पॉजिटिव (00:09:52) नेगेटिव के बीच में डिस्क्रि (00:09:53) डिस्क्रिमिनेशन के लिए यूज़फुल हो सकता है। (00:09:55) आसान और कठिन के बीच में डिस्क्रिमिनेशन (00:09:58) करने के लिए यूज़फुल हो सकता है। अच्छे और (00:10:00) कमजोर छात्रों के बीच में जो फर्क है वो (00:10:02) करने के लिए हम लोग इसका इस्तेमाल कर सकते (00:10:04) हैं। तो सिंपल आप आइटम एनालिसिस को समझिए (00:10:07) कि हम उन सारे आइटम्स को टेस्ट आइटम (00:10:10) आइटम्स को टेस्ट क्वेश्चंस को एनालिसिस (00:10:12) करते हैं ताकि यह समझ सके वो कितने अच्छे (00:10:14) से काम करेगा। ठीक है? उसकी जो प्रॉपर्टीज (00:10:17) है वो रेलेवेंस होने चाहिए। ठीक है? तो (00:10:20) आइटम एनालिसिस (00:10:22) ये होता है। सब आइटम एनालिसिस के मुख्य (00:10:25) उद्देश्य क्या होते हैं? खराब आइटम को (00:10:28) पहचान करके उसे हटाना यानी कि जो यूज़फुल (00:10:30) नहीं है उसको क्या करना? साइड कर देना। (00:10:32) दूसरा वैलिड एंड रिलायबल टेस्ट को तैयार (00:10:34) करना। ठीक है? वैलिड और रिलायबल टेस्ट (00:10:36) रहेगा। तैयार करना होता है। हर प्रश्न की (00:10:39) क्वालिटी को साइंटिफिक तरीके से मेजर करना (00:10:41) भी इसका उद्देश्य होता है टर्म एनालिसिस (00:10:44) का। ठीक? अब टाइप ऑफ आइटम एनालिसिस की बात (00:10:46) करते हैं। तो टाइप ऑफ आइटम आइटम एनालिसिस (00:10:49) में पहला होता है आइटम डिफिकल्टी इंडेक्स (00:10:52) जिसे हम पी वैल्यू के इससे जानते हैं। ठीक (00:10:55) है? तो इसका जो फार्मूला होता है ये बताता (00:10:57) है कि किसी आइटम को कितने प्रतिशत लोगों (00:11:01) ने सही किया है। तो इसको फार्मूला आप याद (00:11:03) करिएगा कि P = करेक्ट रिस्पांस डिवाइडेड (00:11:06) बाय टोटल रिस्पांस। ठीक है? अब इसमें जो P (00:11:10) की वैल्यू जो होती है 0.09 बहुत आसान (00:11:13) प्रश्न है। आएगी तो यह या आप इंटरप्रेट कर (00:11:15) सकते हैं। अगर पी की वैल्यू 0.20 आता है (00:11:18) तो बहुत कठिन प्रश्न है। सिर्फ 20% ने ही (00:11:20) सही किया और आइडियल पी वैल्यू जो होती है (00:11:22) वो 0.30 से 0.70 के बीच में होती है। (00:11:26) कभी-कभी यहां से भी डायरेक्ट क्वेश्चन आ (00:11:28) जाता है कि आइटम डिफिकल्टी इंडेक्स में जो (00:11:31) आइडियल वैल्यू होती है वो कितना होता है? (00:11:33) तो वहां पे ऑप्शंस दिया रहेगा। ये ऑप्शन (00:11:35) अगर आपको कहीं पे भी दिखता है तो आप इस (00:11:37) चीज को सिंपली पुट कर सकते हैं। ठीक है? (00:11:41) अब दूसरा होता है आइटम डिस्क्रिमिनेशन (00:11:43) इंडेक्स जिसे हम डी वैल्यू से रिप्रेजेंट (00:11:45) करते हैं। तो इसका फार्मूला होता है डी (00:11:47) वैल्यू ये दिखाता है कि कोई आइटम हाई (00:11:49) स्कोरर लो स्कोरर के बीच कितनी अच्छी तरह (00:11:51) से वर्क कर सकता है। ठीक है? ठीक है? यानी (00:11:53) कि हाई स्कोरर जो है और लो स्कोरर जो है (00:11:56) उनके बीच में कितना अच्छे से डिफरेंस कर (00:11:58) सकता है इस चीज को रिप्रेजेंट करता है। तो (00:12:00) यहां पे जो इसका डी इक्वल टू होता है RH - (00:12:03) RL यानी कि हाई स्कोरर हो जाता है। लो (00:12:05) स्कोर हो अप N तो आर एच जो होता है टॉप (00:12:10) 27% शो होता है। ग्रुप में करेक्ट आंसर्स (00:12:13) होते हैं। यानी कि ऊपर से टॉप 20% 27% और (00:12:17) आर्य जो होता है बॉटम से बॉटम से 27% (00:12:20) ग्रुप में करेक्ट आंसर यानी बॉटम से जितने (00:12:23) लोग भी मतलब इसका एक किए होंगे वो इसके (00:12:25) अंतर्गत आ जाएगा और n = ईच ग्रुप का टोटल (00:12:28) नंबर कितना कितना है? तो यह हो जाता है। (00:12:31) इसका इंटरप्रिटेशन यह है कि अगर d की (00:12:33) वैल्यू +1 के करीब आती है तो परफेक्ट (00:12:35) डिस्क्रिमिनेशन को रिप्रेजेंट कर रहा है। (00:12:37) अगर d की वैल्यू जीरो आती है तो कोई फर्क (00:12:39) नहीं कर रहा है। यानी कि नो यूज़फुल अगर d (00:12:42) इज स्मॉलर देन ज़ीरो हो जा रहा है तो अगर (00:12:45) गलत आइटम है रिजेक्ट एंड रिवाइज की जरूरत (00:12:47) है उस चीज को। ठीक है? तो आप इस चीज को भी (00:12:49) याद रखिए। कभी-कभी यहां से भी डायरेक्ट (00:12:51) एमसीक्यूस आ जाते हैं एग्जाम में। ओके? सो (00:12:55) गाइस आज के इस एपिसोड में बस हम लोग इतना (00:12:57) ही रखते हैं और नेक्स्ट एपिसोड में हम लोग (00:12:58) इसी से रिलेटेड एमसीक्यूस को डिस्कस (00:13:00) करेंगे ताकि ये सारे कांसेप्ट क्लियर होते (00:13:02) चले जाए। ठीक है? तो आज के इस एपिसोड में (00:13:04) बस इतना ही रखते हैं। मिलते हैं नेक्स्ट (00:13:06) एपिसोड में। कीप साइनिंग गाइस। बाय बाय।

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